श्रीजयदेव गोस्वामी की महिमा
हरिकथा, श्रील भक्ति बल्लभ तीर्थ गोस्वामी महाराज
गीत गोविन्द व दशावतार स्तोत्रम् के रचयिता श्रीजयदेव के सम्बन्ध में अनेक अलौकिक प्रसंग सुने जाते हैं। श्रील गुरुदेव ने श्रीजयदेव गोस्वामी की तिरोभाव तिथि पर कीर्तित उनकी महिमा कथा में कुछ एक प्रसंगों का विस्तार से वर्णन किया है। श्रीजयदेव गोस्वामी के साथ भगवान द्वारा की गई विविध लीलाओं से यह ज्ञात होता है कि भक्त जिस प्रकार भगवान् के प्रति भक्तिमान होते हैं भगवान् भी उसी प्रकार भक्त के प्रति भक्तिमान होते हैं।
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जयदेव गोस्वामी विप्रलंभ-रस के भक्त थे। उन्होंने “श्री गीत गोविन्द” नामक एक अप्राकृत विप्रलम्भ रसपूर्ण कविता ग्रन्थ की रचना की। जिसे सुनने के लिए जगन्नाथ स्वयं अपने मंदिर से बहार निकल कर जंगल में गए, उनको बाहर जाने की क्या आवश्यकता थी, वे मंदिर में रहकर ही गीत का श्रवण कर सकते थे, किन्तु उस गीति की रचना जयदेव गोस्वामी ने की थी, इसलिए अपने प्रिय भक्त की महिमा बढाने के लिए वे स्वयं ही चले गए। आज भी जगन्नाथ जी प्रतिदिन ‘गीत गोविन्द’ का रसास्वादन करते हैं। भगवान सदैव ही अपने भक्तों की महिमा वर्धन करते रहते हैं, जैसे 'प्रतिष्ठानपुर' नामक स्थान का एक गरीब ब्राह्मण जो कहाँ अनंत कोटि ब्रह्माण्ड में एक छोटी सी पृथ्वी के किसी कोने में वास करता था और भगवान नारायण की उपासना करता था, सभी जीवों में परमात्मा रूप से विराजमान होने के कारण भगवान जानते थे कि वह ब्राह्मण कितनी निष्ठा के साथ उनकी पूजा करता है। वह ब्राह्मण नारायण का एकान्तिक भक्त था किन्तु अत्यंत दरिद्र था.यद्यपि सांसारिक दृष्टि से वह गरीबी से त्रस्त था किन्तु वास्तविकता में वही धनी था। विदुर बाहरिक दृष्टी से अत्यंत दरिद्र प्रतीत होते हैं किन्तु तात्त्विक भाव से विदुर-विदुर पत्नी महाधनी है। यदि हम विश्लेषण करें तो हम यह समझ सकते हैं कि केवल वही व्यक्ति धनी है जो भगवान की उपासना करता है, सांसरिक दृष्टी से जो धनी दिखालाई पड़ते हैं, वे संसार की नश्वर नाशवान वस्तुओं में आसक्त हैं, जिसमें वास्तव आनंद का अभाव है, उस धन को प्राप्तकर उन्होंने क्या लाभ प्राप्त किया जबकि भगवान नित्य और सब प्रकार के ऐश्वर्यों से युक्त हैं। जो व्यक्ति भगवान की पूजा नहीं करता वह धनी नहीं हो सकता। यह चैतन्य चरितामृत में लिखा गया है,
प्रेम धन विना व्यर्थ दरिद्र जीवन।
दास करि वेतन मोरे देह प्रेम धन॥(प्रेमधन के बिना मेरा जीवन व्यर्थ और दरिद्र है। कृपया आप मुझे अपना सेवक बना लीजिए और कृष्णप्रेम धन रूपी वेतन प्रदान कीजिए।)
भगवद्प्रेम का राज्य इस भौतिक जगत से पूर्ण रूप से भिन्न है। मुझ जैसा कामातुर बद्ध जीव उस चिन्मय जगत का वर्णन नहीं कर सकता। हमारे गुरुदेव उस परम्परा में आए हैं, जो स्वयं भगवान से आरंभ हुई है। महाप्रभु ने स्वयं को अपने पार्षदों के रूप में विस्तारित किया। हमारे गुरुवर्ग और श्रील प्रभुपाद भी उनमें से एक हैं।आध्यात्मिक जगत में श्रील प्रभुपाद श्री नयनमणि मंजरी हैं। इसलिए हमारे गुरुदेव ने अपने गुरुदेव श्रील प्रभुपाद के स्मरण में विग्रहों के नाम 'नयनानाथ', 'नयनानंद', 'नयनमणि' और 'नयनमोहन' रखे। जयदेव गोस्वामी जगन्नाथ देव एवं गौरांग महाप्रभु के सर्वोत्तम भक्त हैं, यदि हम उनके चरणों में शरणागत नहीं होते हैं तो उनके गुरुदेव और आगे उनके गुरुदेव इस प्रकार से पूर्ण परंपरा में ही विच्छेद आ जाएगा।
यदि हम भक्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो हमें गुरु परम्परा में शरणागत होना चाहिए। हमारे परमगुरुदेव, श्रील प्रभुपाद अपनी पत्रावली में प्रायः लिखा करते थे-
आमि गुरु-परम्परा ते प्रणति ज्ञापन करछि। (मैं गुरु-परम्परा को अपना प्रणाम ज्ञापन करता हूँ।)
वह अपने गुरुदेव और गुरु परम्परा से कृपा प्रार्थना कर रहे हैं। इसलिए जब तक कोई व्यक्ति गुरु परम्परा में पूर्ण रूप से शरणागत नहीं होगा, उसे भगवद्-अनुभूति नहीं हो सकती। भगवद् ज्ञान एक स्वतः सिद्ध एवं स्वयं प्रकाश वस्तु है। पूज्यपाद श्रील स्वामी महाराज प्रायः कहा करते थे—
“When one is enlightened with the knowledge by which ignorance is destroyed then his knowledge reveals everything as sun lights up everything at day time.”
हमें श्रील स्वामी महाराज जी द्वारा कहे गए इस वाक्य पर गहन चिंतन करना चाहिए। भगवद्-ज्ञान स्वयं प्रकाशित है। अपनी जागतिक बुद्धि अथवा ज्ञान के द्वारा भगवद्-ज्ञान अर्जित नहीं किया जा सकता। इसे एक उदाहरण के द्वारा समझा जा सकता है। जब रात होती है, इस जगत के सब प्रकार के प्रकाश के स्त्रोत एकत्रित करने पर भी यदि हम सूर्य को देखने का प्रयास करें तो हम उसे नहीं देख सकते। जब सूर्य उदित होता है, तो उसकी किरणों के माध्यम से हम न केवल सूर्य को, अपितु इस जगत की सभी वस्तुओं को भी देख सकते हैं। इसी तरह जब भगवान हमारे हृदय में गुरु परम्परा के माध्यम से प्रकट होंगे, तो हम अपने और सभी के वास्तविक स्वरूप को देख सकते हैं। शुद्ध भक्त अपने आराध्यदेव का प्रत्येक वस्तु में दर्शन कर सकता है, चाहे वह मनुष्य, पक्षी,पशु इत्यादि चेतन प्राणी हों अथवा पहाड़, पेड़ आदि जड़ पदार्थ हों। भगवान स्वयं प्रकाशित होंगे, उन्हें जानने का कोई और उपाय नहीं है। परमेश्वर श्रीकृष्ण, जो अवतारी हैं, मुझ जैसे सीमित बुद्धि वाले व्यक्तियों द्वारा जाने नहीं जा सकते। एक बार मैंने श्रील भक्ति प्रमोद पुरी गोस्वामी महाराज जी को निम्नलिखित पत्र लिखा, “मैंने मठ में आकर अपने गुरुदेव का आश्रय ग्रहण किया।किन्तु फिर भी मेरे चित्त की मलिनता अभी तक दूर नहीं हुई है। यह कब दूर होगी?”
श्रील पुरी गोस्वामी महाराज जी ने मुझे कहा वैष्णवों का स्मरण, उनकी महिमा का कीर्तन एवं उनसे कृपा प्रार्थना करने से सर्वार्थ -सिद्धि होगी।
'वैष्णवेर गुणगान करिले जीवेर त्राण'― वैष्णवों के अप्राकृत गुणों के कीर्तन द्वारा जीवों का परित्राण हो सकता है। इसलिए मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि आप वैष्णवों के चरित्र को ग्रन्थ के रूप में लिपिबद्ध करें। मैंने उनसे कहा कि मैं यह कार्य करने के लिए असमर्थ हूँ किन्तु यदि आप कृपा करके मार्गदर्शन करें तो मैं प्रयास करूँगा। उन्होंने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया और मुझपर अपनी कृपा-वर्षा की। उसके बाद मैंने उनकी इच्छानुसार वैष्णवों के बारे में लिखा। मैंने लिखने से पहले कई ग्रन्थों का अध्ययन किया। वैष्णवों के आविर्भाव, तिरोभाव के स्थान, समय इत्यादि विषय में यथार्थ जानकारी प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य था। हमें वैष्णवों को उनकी आविर्भाव और तिरोभाव तिथियों में स्मरण करना चाहिए।
अधिकांश लोगों का कहना है कि श्री जयदेव गोस्वामी का आविर्भाव केंदुबिल्व नामक गाँव में हुआ था, जो वर्तमान में वीरभूम जिले में स्थित है। यह गाँव वीरभूम ज़िला के शिउरी से 20 मील दूर दक्षिण में अजय नदी के तट पर स्थित है। एकचक्र धाम, भगवान नित्यानंद के आविर्भाव स्थान भी वीरभूम जिले में स्थित है। नित्यानंद प्रभु एक ब्राह्मण परिवार में, हाड़ाई पंडित और पद्मावती देवी को अपने माता-पिता के रूप में स्वीकार कर प्रकट हुए। शिउरी में हमारे गुरुदेव के एक गुरुभ्राता, श्रीमद् भक्तिसौरभ भक्तिसार महाराज जी ने 'नित्यानंद गौड़ीय मठ' नामक एक मठ की स्थापना की। मैं वहाँ दो बार गया। वर्तमान समय में वहाँ कोई मठ नहीं है। बाद में वे मायापुर चले गए और 'गौरांग मठ' नाम से एक मठ की स्थापना की।
केंदुबिल्व गांव, अजय नद के तट पर शिउरी से बीस मील दक्षिण में स्थित है। जयदेव गोस्वामी उस गाँव में आविर्भूत हुए। ऐसा कहा जाता है कि जयदेव जी को अजय नद से श्रीराधामाधव जी के श्रीविग्रह प्राप्त हुए थे। वे अजय नद के किनारे कुशेश्वर शिव के स्थान पर बैठकर साधन-भजन में निमग्न रहते थे। उनके पिता भोजदेव और माता वामा देवी थीं। केंदुबिल्व ग्राम में माघी संक्रान्ति के दिन मेला लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जयदेव गोस्वामी का स्थान यही केंदुबिल्व नमक गाँव है, अन्य मत के अनुसार जयदेव गोस्वामी का आविर्भाव उत्कल देश में हुआ, तो किसी के मतानुसार उनका आविर्भाव स्थान दक्षिण भारत में है। वे 11वें या 12वें शकाब्द में आविर्भूत हुए और महाप्रभु 15वें शकाब्द में आविर्भूत हुए। इसलिए जयदेव गोस्वामी महाप्रभु से 200 से 300 साल पहले इस जगत में आए। यद्यपि जागतिक दृष्टि से वे एक-दूसरे से नहीं मिले थे किन्तु अप्राकृत भूमिका में उन्होंने महाप्रभु के दर्शन प्राप्त किए थे।
हम नवद्वीप धाम परिक्रमा के समय चंपक हट्ट नामक स्थान पर जाते हैं, जिसका नाम चंपा के फूलों के नाम पर पड़ा है। वहाँ पहले चम्पा के फूलों के बहुत से वृक्ष होते थे और हाट(बाज़ार) में उन चम्पा के फूलों की बिक्री हुआ करती थी। इसलिए उस स्थान का नाम चम्पक हट्ट हुआ जो कालान्तर में बिगड़ कर चाम्पाहाटी बन गया। गौरांग महाप्रभु भी चम्पक वर्ण के थे। उस स्थान पर सतयुग में एक ब्राह्मण रहते थे। वह श्रीराधाकृष्ण की आराधना करते थे। उसकी पूजा से संतुष्ट होकर, एक दिन, श्रीराधाकृष्ण ने उन्हें श्रीगौरांग रूप में दर्शन दिए। श्रीराधाकृष्ण मिलित तनु अर्थात् गौरांग रूप माधुर्य से परिपूर्ण है जिसके समान कुछ भी नहीं है। गौरांग महाप्रभु के इस रूप के अदर्शन से विरह संतप्त होने पर श्रीमन्महाप्रभु ने उनसे कहा— “शोक मत करो। जब मैं कलियुग में प्रकट होऊंगा तो तुम भी मेरे निजी पार्षद बनकर आओगे।” महाप्रभु के पार्षद द्विज वाणीनाथ ही पूर्व जन्म में सत्ययुग के वह ब्राह्मण थे और श्री गौरंग महाप्रभु निरंतर स्मरण करते थे। वहाँ पर गदाई-गौरांग(श्रीमन्महाप्रभु और श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामी) विग्रह रूप से प्रकट हुए।
जब जयदेव गोस्वामी जब इस जगत में लीला कर रहे थे, उस समय बल्लालसेन के पुत्र, लक्ष्मणसेन बंग देश के राजा थे(संपूर्ण मायापुर और नवद्वीप उनके राज्य में ही था)। उन्होंने जयदेव गोस्वामी से (जगन्नाथ पुरी न जाकर) नवद्वीप धाम में ही रहने का अनुरोध किया और चाम्पाहाटी ग्राम में उनके लिए एक कुटिया का निर्माण करवा दिया जहाँ पर वे शान्तिपूर्वक निवास कर सकें। जयदेव गोस्वामी चम्पक-हट्ट में रुके थे, जिस स्थान पर महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को दर्शन दिए थे। उन्होंने वहाँ तीव्र वैराग्य के साथ भजन किया था। हम नवद्वीप धाम परिक्रमा के समय उस स्थान पर प्रणाम करने जाते हैं और श्रीजयदेव गोस्वामी और श्री गौर-गदाधर की कृपा-प्रार्थना करते हैं। आशुतोष देब के बंगला कोष के अनुसार जयदेव गोस्वामी लक्ष्मण सेन की सभा में राजकवि थे।
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने ‘नवद्वीप धाम महात्म्य’ नामक अपने ग्रन्थ में लिखा है कि बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन ने जयदेव गोस्वामी द्वारा रचित ‘दशावतार-स्तोत्र’ को अपनी राजसभा के तत्कालीन पण्डित गोवर्धन आचार्य जी से सुना था। इसे सुनकर राजा चमत्कृत हो उठे और सोचने लगे कि यह सुंदर रचना कौन कर सकता है। गोवर्धन ने उन्हें जयदेव के बारे में बताया और कहा कि वह एक साधु पुरुष हैं, उनके समक्ष ऐसे राजवेश में जाना उचित नहीं होगा। जयदेव जी के बारे में सुनकर लक्ष्मणसेन एक साधारण वेश में उनके दर्शन के लिए गए और जयदेव गोस्वामी के अलौकिक व्यक्तित्व का दर्शन करके उनके प्रति और आकर्षित हो गए। जयदेव गोस्वामी रचित 'श्रीगीत-गोविन्द' तो बहुत उच्च अधिकार की वस्तु है किन्तु उनके द्वारा रचित दशावतार-स्तोत्र अंग्रेजी भाषा में एक ग्रन्थ के रूप में भी प्रकाशित हुआ है, दशावतार स्तोत्रं हम कीर्तन करते हैं, उसमें लिखा है -
छलयसि विक्रमणे बलिम् अद्भुत-वामन
पद-नख-नीर-जनित-जन-पावन
केशव धृत-वामन रूप जय जगदीश हरे॥(हे केशव! हे श्रीवामन का रूप धारण करने वाले! जगदीश! हे भक्तों का अहंकार हरने वाले हरे! तुम्हारी जय हो, क्योंकि तुम बलि राजा के द्वारा दी हुई पृथ्वी को नापते समय, बलि राजा को छलते रहते हो, अतः अद्भुत वामन रूप वाले हो। उसी समय तुम्हारे चरणनख से उत्पन्न हुए गंगाजल के द्वारा तुम समस्त जनों को पवित्र बनाने वाले हो।)
यद्यपि भगवान एक वामन(बौना) के रूप में प्रकट हुए, किन्तु फिर भी वे उस रूप में बहुत प्यारे और सुन्दर दिख रहे थे। वे अपने हाथ में एक बड़ा छाता पकड़ कर चल रहे थे जो उनके आकार से भी बड़ा लग रहा था। भगवान वामनदेव के रूप को देखकर रत्नावली नामक बलि महाराज की पुत्री के हृदय में वात्सल्य रस उत्पन्न हुआ और वामन देव को गोद में लेकर उनको स्तन पान करने की इच्छा हुई। किन्तु बाद में जब भगवान वामन ने अपने विशाल त्रिविक्रम रूप को धारण किया और रत्नावली के पिता अर्थात् बलि महाराज से त्रिभुवन का स्वामित्व ले लिया, उनको बंदी बना लिया तो वह क्रोधित हो गई और उसने वामन देव को विष खिलाकर मारना चाहा। भगवान ने उसकी दोनों इच्छाएँ पूरी कीं। वह पूतना नामक राक्षसी बनी, जो भगवान को उनके गोपाल रूप में मारने आई थी। वह अपने स्तनों में कालकूट विष लगाकर गोपाल को स्तनपान कराया। यद्यपि एक शिशु के रूप में भगवान ने उसका वध कर दिया, पूतना के विशाल मृत शरीर से चन्दन गंध चारो ओर फैल रही थी, भगवान् ने उसे धात्रोचित गति(धाई माँ की गति) प्रदान की, जो कठोर तपस्या से भी प्राप्त नहीं होता है।
इस प्रकार भगवान हमें अपनी प्रेममयी सेवा प्रदान करने के लिए विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं। यदि हम इनमें से किसी भी एक रूप को ग्रहण करने में सक्षम हैं, तो हम उन तक पहुंचने में समर्थ होंगे। 'जय जगदीश हरे' अर्थात् ये सब रूपों में अवतरित होना भगवान् की ही लीला है।
जयदेव गोस्वामी से अत्यन्त प्रभावित और आकर्षित होकर, साधारण वेश में आए राजा ने अपना वास्तव परिचय जयदेव गोस्वामी को दिया, उनसे अपने राजमहल में चलकर रहने का अनुरोध किया। श्रीजयदेव जी बहुत ही विषय विरक्त व्यक्ति थे, उन्होंने विषयी राजमहल में आने के लिए अनिच्छा प्रकट की तथा उन्होंने राजा से कहा कि वे वह स्थान छोड़कर जगन्नाथ पुरी के पास गंगानगर में जाकर रहेंगे।
जो भगवान में प्रीतियुक्त हैं एवं जिन्होंने भगवद् राज्य का रसास्वादन कर लिया हो, उन्हें दुनिया के विषय-भोग की कोई कामना तो रहती ही नहीं बल्कि वे उन विषयों की उपेक्षा करते हैं। जयदेव गोस्वामी के निर्णय/संकल्प से राजा लक्ष्मण सेन ने मर्माहत होकर जयदेव जी से नवद्वीप छोड़कर न जाने की प्रार्थना की और बताया कि नवद्वीप मण्डल में रमणीय चांपाहाटी ग्राम उनके रहने योग्य स्थान है। उन्होंने वचन दिया कि वे कभी भी उनकी अनुमति के बिना उनसे मिलने नहीं आयेंगे। राजा लक्ष्मण सेन की दीनोक्ति से सन्तुष्ट होकर श्रीजयदेव जी चांपाहाटी में रहना स्वीकार किया। अर्थात महाप्रभु कि इच्छा थी उन्हें अपने गौरांग रूप में दर्शन प्रदान करने की इसलिए उन्होंने इस प्रकार की व्यवस्था की जयदेव जी की। अनुमति मिलने के साथ ही राजा लक्ष्मण सेन ने चांपाहाटी ग्राम में उनके लिए एक कुटिया का निर्माण करवा दिया था।
जिस प्रकार महाप्रभु के पार्षद द्विज वाणीनाथ ने निरंतर गौरांग महाप्रभु का रूप दर्शन कर रहे थे, उसी प्रकार श्रीजयदेव गोस्वामी भी यहाँ पर पहले श्रीराधाकृष्ण और बाद में उनके मिलित तनु चम्पक वर्ण अर्थात् स्वर्णकान्ति वाले गौरांग महाप्रभु के दर्शन प्राप्त कर मूर्छित हो गए थे।
जब गौरांग महाप्रभु ने जयदेव को दर्शन दिए तो उन्होंने उनसे कहा, “जब मैं इस धराधाम में नवद्वीप में प्रकट होऊँगा, तब संन्यास ग्रहण करने के बाद पुरुषोत्तम धाम में जाकर, तुम्हारे द्वारा रचित ‘गीत गोविन्द’ का आस्वादन करूंगा, इसलिए तुम जगन्नाथ पुरी में जाकर वास करो।”
चण्डीदास, विद्यापति, रायेर, नाटक-गीति,
कर्णामृत, श्री गीत-गोविन्द,
स्वरूप, रामानन्द सने, महाप्रभु रात्रि-दिने,
गाये, शुने-परमानन्द।
(चैतन्य चरितामृत मध्य-लीला 2.77)जब महाप्रभु (गम्भीरा में)सम्पूर्ण रूप से विप्रलम्भ रस द्वारा कृष्णप्रेम का आस्वादन कर रहे थे, तब वे स्वरूप दामोदर प्रभु और राय रामानंद के माध्यम से श्रीजयदेव गोस्वामी द्वारा रचित गीत-गोविंद, कवि कर्णपुर द्वारा रचित कर्णामृत, राय रामानंद द्वारा रचित जगन्नाथ वल्लभ नाटक एवं श्री चंडीदास तथा श्री विद्यापति द्वारा रचित गीत का अस्वादन करते थे। यद्यपि जयदेव गोस्वामी भगवान के भविष्य के निवास स्थान को छोड़ने से अत्यन्त दुःखी थे, उन्होंने प्रभु की आज्ञा का पालन किया और पुरी में जाकर वास किया। वहाँ जगन्नाथ के दर्शन कर वे प्रेम में आप्लुत हो गए थे। कहा जाता है कि वे वहाँ उड़ीसा के राजा के महापण्डित भी हुए थे। श्रीजगन्नाथ पुरी में इस प्रकार की एक किवदंती है कि एक मालिनी पुरुषोत्तम धाम में कहीं बैठकर श्रीजयदेव जी द्वारा रचित श्रीगीत गोविन्द का भाव विभोर होकर गान कर रही थी। श्रीजगन्नाथ देव जी उस गान से आकृष्ट होकर वहीं चले गये और जब तक गीत गोविन्द का गान चलता रहा, वहाँ खड़े होकर वे सुनते रहे तथा उसकी समाप्ति पर ही मन्दिर में वापिस आए।
एक ब्राह्मण के कोई भी सन्तान न होने पर बहुत काल तक उन्होंने श्रीजगन्नाथ देव जी की आराधना की। जगन्नाथ जी की आराधना करने पर उन्हें एक कन्या प्राप्त हुई। उस कन्या का नाम उन्होंने पद्मावती रखा था। विवाह योग्य होने पर वह ब्राह्मण उसे श्रीजगन्नाथ देव जी के श्रीचरणों में अर्पण करने के लिए ले आए। उसे देखकर भगवान पुरुषोत्तम जी ने प्रत्यादेश दिया कि जयदेव नामक मेरे एक सेवक ने संसार धर्म त्याग कर मेरे नाम को ही सार रूप से ग्रहण किया है। तुम उसी को इस कन्या का दान करो। तब ब्राह्मण अपनी उस कन्या को लेकर श्रीजयदेव के निकट उपस्थित हुए, उन्होंने जयदेव जी को जगन्नाथ की कृपा से कन्या की प्राप्ति एवं जगन्नाथ के आदेश के विषय में बतलाकर उनसे उस कन्या का पाणि-ग्रहण करने के लिए बहुत अनुरोध किया किन्तु श्रीजयदेव जी को संसार में प्रवेश करने की इच्छा न होने के कारण ब्राह्मण की बात मानने में असमर्थता प्रकट की। तब ब्राह्मण साक्षात भगवान जगन्नाथ जी के आदेश को किस प्रकार लंघन कर सकता हूँ कहते हुए अपनी कन्या को उनके (जयदेव के) निकट छोड़ कर चले आए।”
जयदेव जी हक्के-बक्के से रह गए और कन्या से बोले- “बोलो तुम कहाँ जाओगी, जहाँ जाना चाहो उसी स्थान पर मैं तुमको छोड़ आऊँ। तुम्हारा यहाँ रहना तो हो नहीं सकता।” पद्मावती कातर स्वर में बोलीं—“पिता जी ने जगन्नाथ देव जी के आदेश से मुझे आपके हाथ में सौंपा है। जगन्नाथ ने आपको ही मेरे स्वामी के रूप में निर्देश किया है, मैं अन्यत्र कहीं नहीं जाऊँगी, यदि आप मेरा परित्याग करेंगे तो मैं आपके चरणों में ही जीवन विसर्जन कर दूँगी।”
जयदेव जी भला तब क्या करते, वे पद्मावती का परित्याग न कर पाये और उनका पाणि-ग्रहण किया, किन्तु यह विवाह जगत के कोई साधारण विवाह से समान नहीं है, दोनों ही भक्त है. जगन्नाथ ने ही अपनी भक्त को जयदेव के पास भेज दिया और बाद में वे जयदेव जी को राधा माधव की सेवा में सहायता करने के लगीं। जयदेव गोस्वामी बाहरिक दृष्टी से तो पुरुष हैं किन्तु भीतर से तात्त्विक रूप से गोपी-भाव में भगवान् कि सेवा करते हैं, जिस प्रकार हमारे श्री भक्ति-विनोद ठाकुर बाह्य रूप में पुरुष हैं किन्तु भीतर से कमल मंजरी हैं। स्वरूप दामोदर, राय रामानंद जागतिक दृष्टी से पुरुष रूप में आए किन्तु वे वास्तव में कमशःललिता एवं विशाखा सखी हैं।
श्रीजयदेव गोस्वामी के जीवन में कई आश्चर्यजनक और अलौकिक घटनाएँ हुई थीं। जयदेव जी उनकी पत्नी दोनों मिलकर प्रेमाविष्ट होकर राधा-माधव जी के विग्रह की सेवा करते थे। भक्त जिस प्रकार भगवान के प्रति भक्तिमान होते हैं, भगवान भी उसी प्रकार भक्त के प्रति भक्तिमान होते हैं। जयदेव जी एक दिन अपनी कुटिया की छत को फूस लगा रहे थे। उस समय बहुत तेज़ धूप थी। भक्त का दु:ख देख कर भगवान से रहा न गया और कार्य शीघ्र पूर्ण हो जाये, यह सोच कर वहाँ जाकर स्वयं फूस को रस्सी के साथ बाँटने (बाँधने) लगे तथा बाँटकर छत पर चढ़े हुए जयदेव जी को पकड़ाने लगे। जयदेव जी को लगा कि उनकी पत्नी ही नीचे रहकर यह कार्य कर रही है। छत को छाने का कार्य शीघ्र पूरा हो गया। नीचे आकर उनको कोई नज़र न आया। पत्नी को पूछा तो उन्होंने बताया कि वे तो और-और कार्यों में ही व्यस्त थीं। तब वे विस्मित चित्त से अपने ठाकुर घर में गये और देखा राधा-माधव जी के हाथों में धूल व रस्सी के महीन-महीन कण लगे हुए हैं, तब उन्हें समझते देर न लगी कि वह सब राधा-माधव जी का ही कार्य था। जयदेव जी अपने ठाकुर श्रीराधा-माधव जी के चरणों में गिर कर रोने लगे।
एक समय कविवर को अपने प्राणधन श्रीराधा-माधव की आविर्भाव तिथि पर उत्सव करने की इच्छा हुई, उसके लिए उन्हें कुछ धन की आवश्यकता पड़ी और वे धन एकत्रित करने के लिए गाँव के बाहर निकले। रूप गोस्वामी ने भी भगवान् की सेवा के लिए भिक्षा मांगी. सनातन गोस्वमी ने भी मदनमोहन के मंदिर निर्माण के लिए भिक्षा ग्रहण की, बाद में तो मूल मदनमोहन विग्रह करौली चले गए, इस प्रकार भक्त स्वयं के लिए नहीं अपितु अपने भगवान् की सेवा करने के लिए धन की भिक्षा ग्रहण करते हैं। कई जगहों पर भ्रमण करने के बाद जब उनके पास पर्याप्त धन एकत्रित हो गया तो वे वापिस अपने गाँव लौटने लगें। परन्तु जब वे भगवान की सेवा के लिए एकत्रित किया हुआ धन वापस लेकर आ रहे थे तो एक दिन मार्ग में उन्हें कुछ डाकुओं ने घेर लिया। उन्होंने उनके हाथ पैर काट कर उन्हें एक कुएँ में फेंक दिया तथा उनका सब धन लूट लिया। देश-देशान्तर में भ्रमण करके एकत्रित किया हुआ उनका धन जब वापसी के समय डाकुओं ने छीन लिया, उनके हाथ-पाँव काट कर उनको एक कुएँ में फेंक दिया, उनके घावों से रक्त बह रहा है, इतनी भयंकर कष्ट-मय स्थति में भी भक्तवर जयदेव उस कुएँ में पड़े-पड़े उच्च स्वर से हरिनाम करते रहे।
इस प्रकार कुएँ में पड़े-पड़े उन्हें तीन दिन हो गए। दैवयोग से तीसरे दिन एक राजा उधर आखेट करने आया। उस स्थान से गुज़रते समय वह कुएँ में से हरि-ध्वनि सुन कर विस्मित हो गया और कुएँ के पास आकर उसने देखा तो एक व्यक्ति जिसके हाथ पैर कटे हुए हैं, कुएँ में पड़ा है तथा ज़ोर-ज़ोर से हरिनाम कर रहा है। उन्होंने जयदेव जी को क्षत-विक्षत अवस्था में कुएँ में से निकलवाया एवं उन्हें अपने साथ राजमहल में लाकर विशेष प्रयत्न से उनकी सेवा-शुश्रूषा करवाने में प्रवृत्त हो गया। राजा तथा रानी के प्रयत्न से जयदेव जी धीरे-धीरे स्वस्थ हो गए।
वे जयदेव जी को परम भक्त जानकर और उनके मृदु कण्ठ से सुमधुर ‘गीत गोविन्द’ सुन कर, उनके चरित्र-माधुर्य पर बहुत मुग्ध हो गए। शीघ्र ही श्रीजयदेव जी की पत्नी पद्मावती को भी राजमहल में लाया गया। राजा-रानी दोनों जयदेव जी व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावित हुए और विष्णु-मन्त्र से दीक्षित होकर उनके शिष्य बन गएँ।
एक दिन जयदेव को उत्पीड़ित करने वाले वे डाकु वैष्णव वेश में राजभवन में अतिथि रूप में आये, जयदेव जी ने उनको पहचान लेने पर भी यथायोग्य सम्मान सहित अतिथि सेवा की व्यवस्था की किन्तु दस्यु जयदेव द्वारा पहचान लिए जाने, पकड़े जाने व दण्डित होने के भय से, आतिथ्य ग्रहण न करके वहाँ से भाग जाने की तैयारी करने लगे।
जयदेव जी उनका अभिप्राय जानकर, राजा से कह कर उन्हें बहुत सा धन दिलवाया तथा राज-कर्मचारियों को साथ देकर विदा करवाया। किन्तु दस्युओं ने सोचा कि जिसे उन्होंने लूंटा था, वह व्यक्ति ने तो उन्हें पहचान लिया है इसलिए वह राजा को सब वृतांत बता देगा और राजा आकर उनको बंदी बनालेगा, यह सोचकर दस्युओं ने कुछ दूर जाकर राजकर्मचारियों को मिथ्या वृतांत सुनाना आरंभ किया, उन्होंने कहा – “आपको और अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं। हम आपको एक गुप्त रहस्य बताते हैं। आप इसे गुप्त रूप से राजा को बता देना। रहस्य यह है कि वैष्णव होने से पहले हम एक राजा के अनुचर थे। हमारे राजा ने हमें उस महन्त बाबा जी (जयदेव जी) की हत्या करने के लिए हमें आदेश दिया, क्योंकि उसने बहुत ही घृणित कार्य किया था किन्तु हमने सिर्फ उसके हाथ-पाँव काट कर उन्हें छोड़ दिया। इसी रहस्य के प्रकाशित होने की आशंका से, तुम्हारे उस महन्त ने राजा से अनुरोध करके हम लोगों को बहुत सा धन दिला कर शीघ्र ही विदा करवा दिया। इस प्रकार उन दस्युओं संपूर्ण रूप से गढ़ी हुई मिथ्या कथा बोलते हुए देख, पृथ्वी देवी इन महापापियों के भार को न सहन कर पायी और राज कर्मचारियों ने देखा कि उनके देखते-देखते पृथ्वी फटी तथा वे पृथ्वी के गर्भ में समा गये।”
श्रीमद भागवतम् में बलि महाराज के प्रसंग में लिखा है, दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने बलि महाराज को वामन देव जी को तीन पग भूमि न देनी पड़े इसलिए मिथ्या बात बोलने का परामर्श दिया, बलि महाराज जी ने कहा था – “एक बार दान देने का वचन देकर, किस प्रकार एक ब्राह्मण को धन के लोभ से एक वंचक की भान्ति निरादरपूर्वक खाली हाथ लौटा दूँ? यदि आपके कहे अनुसार यह भगवान् है तो गुरु का कार्य होता है, शिष्य को भगवान् की सेवा में नियुक्त करना, आप मुझे मिथ्या बोलने का परामर्श क्यों रहे हैं? अपितु मैं तो उसे एक बटू ब्राह्मण के रूप में ही देख रहा हूँ, इसलिए उसके छोटे तिन पग में कितनी भूमि समाएगी? मैं मिथ्या बात नहीं बोल सकता।”
“न ह्यसत्यात् परोधर्म इति होवाच भूरियम्।
सर्वं सोढ़ूमलं मध्ये ऋते अलीकपरं नरम्॥”
(भा.8/20/4)अर्थात् असत्य से बढ़कर और कोई अधर्म नहीं है। इसीलिये तो पृथ्वी देवी ने कहा कि असत्यवादी मनुष्य को छोड़ (मन्दार पर्वत आदि) अतिशय भार को वहन करने में मैं अपने आप को समर्थ समझती हूँ, (अर्थात् मैं सब कुछ सहन कर सकती हूँ परन्तु झूठे मनुष्य का भार सहने में मैं असमर्थ हूँ।) झूठ बोलने जैसा घृणित कार्य ओर कोई नहीं है, इससे वातावरण दूषित हो जाएगा और प्राकृतिक आपदायें आ सकती हैं।
यही कारण था कि पृथ्वी देवी उन पापी दस्युओं का भार और अधिक सहन न कर पाई। वे महापुरुष के विषय में मिथ्या बोलते-बोलते ही भूमि के गर्भ में समा गएँ।
राजा के सेवकों ने जयदेव जैसे महाभागवत के चरणों में अपराधियों के दण्ड को प्रत्यक्ष देखकर राजा के निकट आकर सारी घटना निवेदित की। यह सुनकर राजा-रानी की जयदेव जी एवं पद्मावती देवी के प्रति श्रद्धा और भी अधिक गाढ़ हो गयी। इस प्रकार जयदेव जी का चरित्र अति-अद्भुत है, केवल उनका ही नहीं उनकी पत्नी पद्मादेवी देवी का चरित्र भी अपूर्व है।
कहा जाता है कि रानी के साथ श्रीजयदेव जी की पत्नी की गाढ़ मित्रता हो गई थी। उन दिनों सती होने की प्रथा प्रचलित थी। रानी अपने भाई की मौत पर भाई की पत्नी के समरण (सती होने के लिए) विलाप कर रही थी। इस पर पद्मावती ने रानी से कहा – “स्वामी की मृत्यु पर पतिव्रता पत्नी के प्राण शरीर में नहीं रहते।” राजमहिषी ने पद्मावती के इस वाक्य को सुन कर उसके इस “वाक्य” की परीक्षा के लिए, एक दिन उनको, उनके पति जयदेव के आकस्मिक निधन का समाचार दिया। इस समाचार को सुनते ही पतिव्रता सती पद्मावती ने प्राण त्याग दिये। इस संसार ऐसी भी कोई व्यक्ति है, इस विषय में कभी सोच भी नहीं सकती थी, वह पद्मावती देवी की मृत्यु के स्वयं को दोषी मानकर, बहुत शोक संतप्त होकर रोने लगी। रानी ने सब वृतांत राजा को बताया, राजा रोते-रोते जयदेव जी के पास आए और पद्मावती देवी को पुनः जीवित करने के लिए विशेष भाव से अनुरोध करने लगे। भक्त प्रवर जयदेव जी पद्मावती के कर्ण कुहरों में कृष्ण नामामृत का सिंचन करने लगे। पद्मावती ने नींद से जागे मनुष्य की भान्ति उठ गयीं। यह देखकर राजा-रानी सहित सब लोग बहुत प्रसन्न हो गएँ। इस प्रकार दोनों का चरित्र अति-अद्भुत है।
तत्पश्चात श्रीजयदेव जी वृन्दावन दर्शन के लिए बहुत व्याकुल होकर, राजा-रानी से विदा लेकर अपने इष्टदेव श्रीराधा-माधव जी को साथ लेकर, वृन्दावन की यात्रा पर गए। वहाँ पहुँचकर वे केशी तीर्थ के निकट श्रीराधा-माधव की प्रतिष्ठा करके सेवा करने लगे। वह मन्दिर अभी भी वहाँ पर स्थित है। जयपुर के राजा ने श्रीजयदेव जी के तिरोभाव के पश्चात उनके राधा-माधव विग्रह को केशीघाट, मथुरा से लाकर जयपुर के ‘घाटि’ नामक स्थान में प्रतिष्ठित किया। अब भी श्रीराधा-माधव जी जयपुर राज्य में सेवित होते हैं। हमारे परम गुरुदेव कहा, जयदेव गोस्वामी और पद्मावती देवी अंत समय में जगन्नाथ पुरी में रहे और वहाँ ही उनकी तिरोधान लीला हुई। किन्तु जयदेव जी की तिरोधान लीला पर विभिन्न मत हैं।
ऐसा कहा जाता है कि वृन्दावन में वास करके जयदेव जी अपनी जन्मभूमि केन्दुबिल्व ग्राम में वापिस आकर साधन भजन करने लगे। वे प्रतिदिन बहुत दूर जाकर गंगा स्नान करते। एक दिन दैवयोग से वे गंगा स्नान करने न जा पाये। यद्यपि वे गंगा स्नान को नहीं गये परन्तु इसका उनके मन में बड़ा दु:ख था। उन्हें अति कातर देख गंगा देवी ने स्वयं ही उनके पास आकर केन्दुबिल्व ग्राम में ही प्रवाहित होने लगी। ऐसा संभव है? संभव है, महाप्रभु अपने भक्त कि इच्छा पूर्ण करने के लिए सब कुछ संभव कर देते हैं। जैसे गंगाजी के किनारे शिवजी का मंदिर है, शिवजी कि इच्छा है कि गंगाजी उनके मस्तक पर आ जाए, इस लिए वहाँ शिव मंदिर में गंगाजल से अभिषेक करना पड़ता है, नहीं तो गंगाजी में बाढ़ आ जाएगी और मंदिर में गंगा-जल आ जाएगा। शिव की इच्छा पूर्ति करने के लिए भगवान् ऐसी व्यवस्था करते हैं।
कहा जाता है कि उनके अविर्भाव स्थान पर ही, श्रीजयदेव जी की लीला की परिसमाप्ति हुई। उनकी पवित्र स्मृति की रक्षा के लिए, अब भी प्रतिवर्ष माघ संक्रान्ति के दिन, केन्दुबिल्व ग्राम में मेला लगता है।
उनकी लीलाएँ दिव्य तथा असाधारण हैं। यहाँ तक कि उनकी थोड़ी सी कृपा भी हमें सर्वोच्च कृष्णप्रेम प्रदान कर सकती है। इसलिए आज की तिथि में हम उनकी कृपा-प्रार्थना करते हैं। मुझे उनका दर्शन तो नहीं किया, किन्तु श्रील गुरुदेव का दर्शन किया है, जो उसी परम्परा में आए हैं। यदि हम उस परम्परा में शरणागत होते हैं तो हमें जयदेव गोस्वामी जी की कृपा प्राप्त होगी। किन्तु यदि हम शरणागत नहीं होंगे तो हमें उनकी कृपा या षड्गोस्वामी, स्वरूप दामोदर प्रभु या रायरामानंद प्रभु सब की कृपा नहीं मिलेगी। बिना शरणागति के सब कुछ शून्य है और दूसरी ओर यदि हम शरणागत हो जाएँगे तो हमें सब की पूर्ण कृपा मिलेगी। इसलिए पूर्ण रूप से स्वयं कोभगवान् के चरण कमलों में समर्पित कर देना होगा, इसलिए आज मैं परमाराध्य श्री गुरुदेव की कृपा-प्रार्थना करता हूँ,वे भगवान की कृपामूर्ति हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि वे मुझे मेरी पतित अवस्था से उद्धार करके नवद्वीप धाम में ले आए।
आज की तिथि में मैं श्री गुरुदेव, श्रील जयदेव गोस्वामी, श्रील प्रभुपाद, श्रील भक्तिविनोद ठाकुर एवं सभी के पादपद्मों में अनन्तकोटि साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करता हूँ और उनकी कृपा प्रार्थना करता हूँ जिससे मेरी कृष्ण भक्ति के अतिरिक्त सभी इच्छाएँ नष्ट हो जाएँ और मैं कृष्ण का एकांतिक आश्रय ग्रहण कर स्वयं को उनकी सेवा में नियोजित कर पाऊं।
Sree Chaitanya Gaudiya
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